ट्रंप के ऐलान से पाकिस्तान की उम्मीदों पर फिर गया पानी!
US Iran Peace Deal– अमेरिका-ईरान युद्ध के संभावित विराम की खबरों ने जहां एक ओर पूरी दुनिया को राहत दी है,वहीं दूसरी ओर इस घटना ने पाकिस्तान को बड़ा झटका भी दिया है।दरअसल पाकिस्तान हर युद्ध में अपने आप को इस्लामिक और यूरोपिय देशों के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश करता रहा है,लेकिन हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी है।इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है।हुआ यूं कि, जिस अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौता कराने के पाकिस्तान दावे कर रहा था,वहां कतर बाजी मार गया।
अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने इसके लिए कतर की सराहना भी की है।ट्रंप ने कहा है कि,इस समझौते को संभव बनाने में दोहा का योगदान अहम है।राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान ने पाकिस्तान की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।अब कहीं से भी इस बात की कोई संभावना नहीं रह गई कि, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति विराम कराने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।
असल खिलाड़ी कौन,ट्रंप ने बता दिया
ट्रंप ने साफ कहा कि,”इस समझौते का श्रेय पाने का असल हकदार कतर है,क्योंकि उसने बड़ी मदद की है’’। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कतर की अगुवाई,खासकर अमीर की सराहना करते हुए उन्हें साहसी और प्रभावशाली बताया।राजनीतिक पंडितों की माने तो डोनाल्ड ट्रंप का ये बयान केवल एक औपचारिक प्रशंसा नहीं,बल्कि पश्चिम एशिया की शक्ति संरचना में बदलाव का एक संकेत है।
अगर देखा जाए तो आज दोहा अपने आकार से ज्यादा प्रभाव रखता है।बात चाहे तालिबान वार्ता की हो या फिर गाजा संकट की,कतर हर वक्त मध्यस्थ की भूमिका में नजर आता है।
फिर कैसे चारों खाने चित्त हुआ पाकिस्तान ?
पाकिस्तान काफी लंबे वक्त से अपने भौगोलिक महत्व को अपनी विदेश नीति के बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करता आया है।लेकिन ऐसा करते वक्त शायद वो ये भूल जाता है कि,वैश्विक कूटनीति में केवल भौगोलिक महत्व काम नहीं आता,इसके लिए भरोसा भी बहुत मायने रखता है।
आतंकवाद,राजनीतिक अस्थिरता,आर्थिक संकट जैसे मुद्दों ने पाकिस्तान की विश्वसनीयता को काफी प्रभावित किया है।यही कारण है कि, पाकिस्तान के प्रस्ताव या मध्यस्थता पर कोई भी देश भरोसा करने को तैयार नहीं होता है।आज के वक्त भी जब युद्ध के बीच मध्यस्थता को लेकर बात आई तो पाकिस्तान पर भरोसा करने से बेहतर अमेरिका और ईरान ने कतर को तरजीह दी।उस पर अपना भरोसा जताया।
जिनेवा की ओर झुकाव क्या संकेत देता है?
खबरों के मुताबिक अंतिम वार्ता जिनेवा में हो सकती है।जो इस बात का संकेत है कि, विश्व की बड़ी शक्तियां अब पारंपरिक तटस्थ देशों को प्राथमिकता दे रही हैं।ये कोई पहला मौका नहीं है,पहले भी स्विटजरलैंड कई बड़े मुद्दों की वार्ता का केंद्र रह चुका है।चाहे बात रूस-यूक्रेन युद्ध की हो या फिर भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 के शांति वार्ता की,हर बार जिनेवा ही सबके केंद्र में रहा है।
भारत के लिए आत्ममंथन क्यों है जरूरी?
जानकारों की मानें तो,भारत को पूरे मामले को गंभीरता से लेना चाहिए,क्योंकि ऐसे क्षेत्रीय संकटों पर दिल्ली की भूमिका की हर तरफ चर्चा होती है। हालांकि,हिंदुस्तान की विदेश नीति हमेशा से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है,लेकिन बदलते परिवेश में यह सवाल खड़ा होने लगा है कि,क्या भारत को ऐसे मामलों में अधिक सक्रिय होकर मध्यस्थता की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।
हांलाकि प्रश्न खड़ा करने वालों को ये भी ध्यान रखना होगा कि भारत के कुछ देशों को छोड़कर सभी से संबंध मधुर हैं। और ऐसे भारत का किसी भी पक्ष के मामले में हस्तक्षेप करना या उसके हितों की अनदेखी करके उसे मध्स्थता के लिए तैयार करना कहीं से सही नहीं होगा।
