"Who am I?"

मैं कौन हूँ? — वेदांत की दृष्टि से जीवन, जन्म और मृत्यु का रहस्य

सबसे बड़ा प्रश्न – मैं कौन हूँ?

Mai Kon Hoon। मानव सभ्यता ने विज्ञान, तकनीक और भौतिक विकास में अभूतपूर्व प्रगति की है, किन्तु आज भी एक प्रश्न वैसा ही खड़ा है जैसा हजारों वर्ष पूर्व था—”मैं कौन हूँ?”((Mai Kon Hoon))
क्या मैं केवल यह शरीर हूँ? यदि शरीर ही मैं हूँ, तो शरीर के भीतर हृदय किसके आदेश से धड़कता है? श्वास किसके आदेश से चलती है? भोजन कौन पचाता है? नींद में कौन शरीर का संचालन करता है?
यदि जन्म, मृत्यु, श्वास, हृदय की धड़कन और शरीर की अधिकांश क्रियाएँ हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, तो फिर वास्तविक कर्ता कौन है?
वेदांत इसी प्रश्न का उत्तर देता है। यही उत्तर मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य भी स्पष्ट करता है।
जीवन क्या है?
वेदांत के अनुसार जीवन केवल शरीर का नाम नहीं है।
जीवन वह चेतना है जो शरीर को जीवित रखती है।
जब चेतना शरीर में रहती है, तब शरीर चलता है, बोलता है, सोचता है और कर्म करता है। चेतना निकलते ही वही शरीर पंचतत्त्व में बदल जाता है।
इसलिए वेद कहते हैं—
“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”
— भगवद्गीता (2.20)
अर्थात् आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है।
क्या हम शरीर हैं या आत्मा?
वेदांत स्पष्ट कहता है—
हम शरीर नहीं हैं।
शरीर वस्त्र की तरह है और आत्मा उसका धारण करने वाला।
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है।
“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय…”
— भगवद्गीता (2.22)
यदि सब कुछ मेरे हाथ में नहीं, तो मैं कौन हूँ?
थोड़ा विचार कीजिए—
क्या आपने अपने जन्म का समय चुना?
क्या आपने अपने माता-पिता चुने?
क्या आप अपनी ऊँचाई निर्धारित कर सकते थे?
क्या आप अपनी मृत्यु का समय निश्चित कर सकते हैं?
क्या आप अपनी हृदय गति को जीवनभर स्वयं नियंत्रित करते हैं?
क्या आप नींद में अपनी श्वास चलाते हैं?
उत्तर है—नहीं।
इसका अर्थ है कि शरीर का संचालन किसी गहन व्यवस्था द्वारा हो रहा है।
वेदांत कहता है—
शरीर प्रकृति का है, आत्मा उसका साक्षी है और परमात्मा सम्पूर्ण व्यवस्था का आधार है।
शरीर को वास्तव में कौन चलाता है?
वेदांत तीन स्तरों की बात करता है—
1. शरीर (स्थूल)
जो दिखाई देता है।
2. जीवात्मा
जो शरीर को चेतना प्रदान करती है।
3. परमात्मा
जो सम्पूर्ण सृष्टि के भीतर सर्वव्यापी चेतना के रूप में स्थित हैं।
उपनिषद् कहते हैं—
“ईशावास्यमिदं सर्वम्।”
— ईशोपनिषद्
अर्थात् सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है।
यदि आत्मा अकर्ता है तो कर्म कौन करता है?
यह अत्यंत सूक्ष्म प्रश्न है।
भगवद्गीता (3.27) में कहा गया—
“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।”
अर्थात् सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा सम्पन्न होते हैं।
मनुष्य अहंकारवश सोचता है—
“मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ।”
यही अज्ञान है।
जन्म कैसे होता है?
वेदांत के अनुसार जन्म केवल जैविक प्रक्रिया नहीं है।
जीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार नया शरीर प्राप्त करती है।
कर्म ही अगले जन्म की परिस्थितियाँ निर्धारित करते हैं।
इसीलिए भारतीय दर्शन पुनर्जन्म को स्वीकार करता है।
मृत्यु क्या है?
मृत्यु अंत नहीं है।
मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है।
आत्मा न जलती है, न कटती है, न सूखती है।
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि…”
— भगवद्गीता (2.23)
मानव जीवन का उद्देश्य क्या है?
यदि केवल खाना, कमाना और मर जाना ही जीवन होता, तो मनुष्य और पशु में कोई विशेष अंतर न रहता।
वेदांत कहता है—
मनुष्य जीवन का उद्देश्य है—
आत्मा को जानना।
परमात्मा का अनुभव करना।
कर्मबंधन से मुक्त होना।
मोक्ष प्राप्त करना।
उपनिषद् उद्घोष करते हैं—
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः, मन्तव्यः, निदिध्यासितव्यः।”
— बृहदारण्यक उपनिषद्

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