नई दिल्ली: Supreme court on Cancer Drugs सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं को कई गुना अधिक कीमत वसूलने पर सख्त टिप्पणी की है. सर्वोच्च अदालत ने एक याचिक की सुनवाई के दौरान कहा कि, ये मरीज के साथ दिन दड़ाडे डकैती है. शीर्ष अदालत ने कहा कि, एक दवा की एमआरपी 27000 रुपये थी, जबकि वह रिटेलर्स को 2700 रुपये में मिल रही है. कोर्ट ने पूरे मामले पर हैरानी जताई
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह टिप्पणी किशन चंद जैन और संजय कुलश्रेष्ठ की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की. इन याचिकाओं में ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 की कमियों का मुद्दा उठाया गया है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि, मौजूदा नियमों में कुछ जरूरी दवाओं यानी शेड्यूल्ड ड्रग्स की कीमतें तय होती हैं, लेकिन गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमतों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है.
याचिकाकार्ताओं ने कहा… Supreme court on Cancer Drugs
याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि, इसका फायदा उठाकर दवा कंपनियां बहुत ज्यादा एमआरपी तय कर देती हैं. इस तरह रिटेलर और प्राइवेट अस्पतालों को भारी मुनाफा मिलता है. सुनवाई के दौरान स्थिति पर गंभीर चिंता जताई. कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगते हुए 29 सितंबर को अगली सुनवाई की बात कही.
सरकार का नियंत्रण नहीं..
अपनी याचिका की खुद पैरवी कर रहे किशन चंद जैन ने कहा कि, दवा की शुरुआती कीमत तय करने में सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. उसका नियंत्रण बाद में दवा की कीमत को बढ़ाने पर है. ऐसे में शुरू में ही उत्पादक कितनी ज्यादा कीमत रख देते हैं कि मरीज के लिए दवा खरीदना मुश्किल हो जाता है. बाजार में उपलब्ध कुल दावों में से 17 प्रतिशत ही शेड्यूल्ड ड्रग्स हैं, जिनकी कीमत पर सरकार पूरा नियंत्रण है.
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
यही नहीं याचिकाकर्ताओं ने कहा, “जीवन रक्षक दवाओं की कीमत इतनी ज्यादा रखी गई है कि कई बार मरीज के परिवारों को घर और गहने तक बेचने पड़ते हैं.” इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने सवाल किया कि जब रिटेलर को दवा 2,700 रुपये में मिल रही है, तो लोगों से उसके लिए 27,000 रुपये क्यों लिए जा रहे हैं? दवा की कीमत से जुड़ी सरकार की संसथाएं इस पर कोई एक्शन क्यों नहीं ले रही हैं?
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