Supreme court on CJP

Supreme court on CJP Protest: सुप्रीम कोर्ट में हुआ आर्टिकल 358 का जिक्र, इंटरनेट-मेट्रो बंद..क्या ये आपातकाल है

नई दिल्ली:  Supreme court on CJP Protest  सीजेपी के 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट को लेकर सरकार द्वारा की गई सख्ती पर रविवार को सुप्रीम कोर्ट में विशेष सुनवाई हुई. इस दौरान संविधान के आर्टिकल 358 का जिक्र किया गया. ये मूल रूप से आपातकाल से जुड़ा है. सर्वोच्च अदालत में सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी ने बहस के दौरान ये सवाल उठा कि, सरकार ने मेट्रो स्टेशन, इंटरनेट क्यों बंद किये. उन्होंने कहा कि, 7 हजार लोगों को हिरासत में लिया गया. गुरुस्वामी ने कहा कि, अनुच्छेद-19 के तहत मिले अधिकार तभी निलंबित हो सकते हैं, आर्टिकल 358 लागू हो.

तुषार मेहता ने मांगा जवाब देने का समय

जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की विशेष पीठ रविवार को CJP प्रोटेस्ट के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई, मेट्रो और इंटरनेट बंद करने के मामले की सुनवाई कर रही थी. कोर्ट में प्रदर्शनकारियों की ओर से कपिल सिब्बल, मेनका गुरुस्वामी, शैलेंद्र मणि त्रिपाठी, चांद कुरैशी और इंदिरा जय सिंह समेत अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि सरकार की ओर से सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता थे. कोर्ट में सॉलिस्टिर जनरल तुषार मेहता ने लगाए गए आरोपों को गलत बताया. उन्होंने कहा कि ये याचिकाएं केंद्र सरकार को उपलब्ध नहीं कराई गईं थीं, इसीलिए सरकार को इन पर जवाब देने का समय चाहिए.

जानिए क्या कहता है आर्टिकल 358

भारतीय संविधान का आर्टिकल-358 इमरजेंसी से संबंधित है. हालांकि यह हर तरह के आपातकाल पर लागू नहीं होता. यह तब लागू होता है जब देश किसी युद्ध या बाहरी आक्रमण से गुजर रहा हो. इसके लागू होते ही संविधान में नागरिक अधिकारों की संरक्षा करने वाला अनुच्छेद-19 अपने आप निलंबित हो जाता है. इसके लिए राष्ट्रपति की ओर से अलग से कोई घोषणा नहीं करनी होती है. आर्टिकल-358 के लागू रहने के दौरान राज्य कोई भी नियम या कानून बनाने में सक्षम है, लेकिन ये कानून तब तक ही माने जाएंगे जब तक अनुच्छेद 358 लागू रहता है. इसके समाप्त होते ही नए नियम भी रद्द हो जाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने दिये निर्देश

पक्ष और विपक्ष की दलीलों को सुनने के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत ने निर्देश दिए कि दिल्ली में जो भी बैरिकेड्स लगाए गए हैं, उन्हें हटाया जाए और इंटरनेट सेवा बहाल की जाए. अदालत ने ट्रेन और मेट्रो सेवाओं को भी सामान्य समय करने को कहा. हालांकि कोर्ट ने ये कहा कि अगर सार्वजिनक व्यवस्था की स्थिति गंभीर होती है तो प्रशासन कानून के हिसाब से कदम उठा सकता है. मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं की ओर से कोर्ट के साथ वकीलों के साथ भी दुर्व्यवहार के बारे में बताया गया. इस पर कोर्ट ने साफ किया कि वकीलों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा नहीं पहुंचाई जानी चाहिए.

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