Pawan Khera on PM Modi

H-1B वीजा और PERM पर अमेरिकी सख्ती को लेकर पवन खेड़ा का PM मोदी पर निशाना, ट्रंप को लेकर कही ये बात

Pawan Khera on PM Modi: अमेरिका में भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों से जुड़े इमिग्रेशन नियमों को लेकर कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने प्रधानमंत्री मजबूती से अपना पक्ष नहीं रख रहे हैं। यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका ने कई बड़ी टेक कंपनियों के लिए स्थायी निवास से जुड़ी PERM प्रक्रिया के तहत नए आवेदन दाखिल करने पर अस्थायी रोक लगाई है।

राहुल गांधी की सलाह का भी किया जिक्र
पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर कहा कि H-1B वीजा की ऊंची फीस के कारण अमेरिकी कंपनियां भारतीय पेशेवरों को नौकरी देने के फैसले पर दोबारा विचार कर रही हैं। उन्होंने दावा किया कि PERM कार्यक्रम पर रोक से अमेरिका में काम कर रही भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अपने कर्मचारियों को स्थायी निवास दिलाने की प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।

खेड़ा ने अपने पोस्ट में राहुल गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका के साथ बातचीत में मजबूती से अपना पक्ष रखने की सलाह बार-बार दी है। कांग्रेस नेता ने तंज कसते हुए आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री अपने मित्र डोनाल्ड ट्रंप के सामने सख्त रुख अपनाने के बजाय दबाव में आ रहे हैं। हालांकि, ये टिप्पणियां पवन खेड़ा के राजनीतिक आरोप हैं।

क्या है PERM कार्यक्रम और किस पर पड़ा असर?
अमेरिका के श्रम विभाग ने कई बड़ी आईटी कंपनियों को PERM कार्यक्रम के तहत नए आवेदन दाखिल करने से अस्थायी रूप से रोकने की घोषणा की है। इस सूची में भारतीय आईटी कंपनियों के साथ माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी अमेरिकी कंपनियां भी शामिल बताई गई हैं। PERM यानी Permanent Labor Certification अमेरिकी नियोक्ताओं के लिए विदेशी कर्मचारी को स्थायी नौकरी पर रखने और उसके रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण चरण है। इस प्रक्रिया में आम तौर पर नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं है और विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन या कामकाजी स्थितियों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।

अमेरिकी श्रम विभाग ने कंपनियों के खिलाफ चल रही कई संघीय जांचों को इस कार्रवाई से जोड़ा है। विभाग के श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग ने कहा कि प्रभावित कंपनियों से जुड़े नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और लंबित PERM आवेदनों की प्रक्रिया भी नहीं की जाएगी।

H-1B और PERM में क्या है अंतर?
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को कुछ विशेष व्यवसायों में विदेशी पेशेवरों को अस्थायी रूप से नियुक्त करने की अनुमति देता है। वहीं, PERM प्रक्रिया रोजगार-आधारित स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने के रास्ते का हिस्सा है। इसलिए PERM आवेदन पर रोक का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि सभी भारतीय पेशेवरों के H-1B वीजा रद्द हो गए हैं या अमेरिका में काम कर रहे सभी कर्मचारियों को देश छोड़ना होगा। इसका सीधा असर संबंधित कंपनियों की स्थायी श्रम प्रमाणन प्रक्रिया पर पड़ सकता है। वास्तविक प्रभाव कंपनी और कर्मचारी की व्यक्तिगत इमिग्रेशन स्थिति पर निर्भर करेगा।

NASSCOM ने क्या कहा?
भारतीय आईटी उद्योग के संगठन NASSCOM ने कहा कि इमिग्रेशन और कुशल पेशेवरों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही दो अलग-अलग मुद्दे हैं, इसलिए इन्हें एक ही नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। संगठन के मुताबिक, भारतीय टेक कंपनियों ने पिछले वर्षों में H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता कम की है। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका में स्थानीय कर्मचारियों की नियुक्ति बढ़ाई है और वहां मजबूत कार्यबल तैयार किया है। NASSCOM ने यह भी कहा कि भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका की बड़ी कंपनियों के साथ काम करती हैं और उनके नवाचार तथा कारोबार के विस्तार में योगदान देती हैं। संगठन के अनुसार, H-1B वीजा से स्थायी निवास की प्रक्रिया में जाने वाले कर्मचारियों की संख्या तुलनात्मक रूप से सीमित है। NASSCOM ने भरोसा जताया कि भारतीय टेक कंपनियां अमेरिका सहित उन सभी देशों के स्थानीय कानूनों और नियामकीय नियमों का पालन करती रहेंगी, जहां वे कारोबार करती हैं।

माइक्रोसॉफ्ट ने भी दी प्रतिक्रिया
PERM कार्यक्रम से जुड़ी कार्रवाई के बाद माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि उसे अमेरिकी कार्यबल की क्षमता और प्रतिभा पर भरोसा है। कंपनी के मुताबिक, नए कर्मचारियों से जुड़े उसके बाकी H-1B आवेदन उन लोगों के लिए थे, जो पहले से अमेरिका में कानूनी रूप से मौजूद थे और कंपनी से जुड़ना चाहते थे। माइक्रोसॉफ्ट ने स्पष्ट किया कि ये कर्मचारी अमेरिका में नए आने वाले लोग नहीं थे और कंपनी के अमेरिकी कार्यबल का लगभग एक प्रतिशत हिस्सा थे।

अमेरिकी सरकार ने गिनाए जांच और नियुक्तियों से जुड़े आंकड़े
अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग के मुताबिक, सूची में शामिल कंपनियों ने 2009 से अब तक करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों की मांग की थी। उन्होंने दावा किया कि इन कंपनियों को 2.30 लाख से अधिक H-1B वीजा मंजूरियां और एक लाख से अधिक स्थायी श्रम प्रमाणन मिले। अमेरिकी प्रशासन ने इन आंकड़ों का इस्तेमाल घरेलू कर्मचारियों के रोजगार की सुरक्षा से जुड़ी अपनी दलील के समर्थन में किया है। हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि हर विदेशी कर्मचारी ने किसी अमेरिकी कर्मचारी की नौकरी छीनी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिकी प्रशासन ने F-1 वीजा पर आने वाले विद्यार्थियों के लिए OPT कार्यक्रम से जुड़ी नई फीस का प्रस्ताव भी रखा है। प्रशासन ने इसे अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा और इमिग्रेशन व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश बताया है।

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