Morwa Protest

Morwa Protest: मोरवा विस्थापितों की एकजुटता के आगे झुका प्रबंधन, 22 मांगों पर सहमति, शेष के लिए अल्टीमेटम

सिंगरौली: (मनीष चौधरी की रिपोर्ट ) मोरवा विस्थापन (Morwa Protest) की मांगों को लेकर बुधवार को (नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) एनसीएल मुख्यालय के घेराव के साथ शुरू हुआ आंदोलन देर रात तक जारी रहा. सुबह से हजारों की संख्या में लोग एनसीएल मुख्यालय के सामने जुटे और सभी गेटों पर तालाबंदी कर दी गई. आंदोलन की खास बात यह रही कि मोरवा विस्थापन से जुड़े सभी मंच एकजुट होकर एक ही मंच पर दिखाई दिए. विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, जनप्रतिनिधि, विस्थापन मंचों के पदाधिकारी और प्रभावित परिवारों ने संयुक्त रूप से पुनर्वास, मुआवजा और आर एंड आर के मुद्दे उठाए.

दिनभर चले आंदोलन के बाद देर शाम एनसीएल पुनर्स्थापना सेल के महाप्रबंधक निरंजन रुक्मांगद आंदोलनकारियों के बीच पहुंचे और मांगों पर बातचीत की. उन्होंने आंदोलनकारियों द्वारा रखी गई 45 मांगों में से 22 मांगों पर सहमति जताई, जबकि शेष मांगों में से कई पर असहमति जताते हुए वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा की आवश्यकता बताई.

22 मांगों पर सहमति, कई अहम मुद्दे अभी लंबित

बातचीत के दौरान पुनर्स्थापना सेल के जीएम ने आंदोलनकारियों को बताया कि उनकी 45 मांगों में से 22 बिंदुओं पर प्रबंधन की सहमति है. इनमें विस्थापित परिवारों के पुनर्वास, दस्तावेजी प्रक्रिया, प्रभावित परिवारों को मिलने वाले लाभ और अन्य पुनर्वास संबंधी कई मांगें शामिल हैं.

आंदोलनकारियों की ओर से रखी गई मांगों में विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए नगर निगम अथवा टाउन क्षेत्र में भूमि आवंटन, शैक्षणिक एवं धार्मिक संस्थानों तथा अन्य सार्वजनिक उपयोग की संरचनाओं के पुनर्स्थापन, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पुनर्वास, प्रभावित परिवारों के लिए रोजगार तथा अन्य आर एंड आर लाभ जैसे मुद्दे प्रमुख रहे.

इसके अलावा विस्थापित परिवारों को उनके मकान, भवन एवं परिसंपत्तियों का उचित मूल्यांकन, विस्थापन लाभ और दस्तावेजों की प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग भी रखी गई.

NCL Protest in Morwa
NCL Protest in Morwa

शासकीय भूमि पर बसे लोगों का मुद्दा बना सबसे बड़ा विवाद

इस दौरान शासकीय भूमि पर बसे प्रभावित परिवारों को पट्टाधारकों के समान दर्जा देने की मांग पर सहमति नहीं बन सकी. यह मुद्दा आंदोलनकारियों के बीच भी सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय बना रहा.

आंदोलनकारियों का कहना था कि यदि सभी विस्थापित मंच एकजुट होकर आंदोलन कर रहे हैं तो सभी प्रभावित परिवारों के अधिकारों को समान रूप से सामने रखा जाना चाहिए. वहीं प्रबंधन की ओर से इस विषय पर वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा किए जाने की बात कही गई.

शासकीय भूमि पर लंबे समय से रह रहे परिवारों का कहना है कि उन्होंने भी मोरवा में अपना घर, व्यवसाय और जीवन बसाया है, इसलिए विस्थापन के समय उन्हें भी सम्मानजनक पुनर्वास एवं निर्धारित लाभ मिलना चाहिए.

व्यवसाय और परिसंपत्तियों के मूल्यांकन पर भी उठे सवाल

आंदोलन में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पुनर्वास और उनकी परिसंपत्तियों के मूल्यांकन को लेकर भी मांगें रखी गईं. प्रभावितों ने मांग की कि, मकान, दुकान, भवन, निर्माण एवं अन्य परिसंपत्तियों का वास्तविक मूल्यांकन किया जाए और विस्थापित होने वाले व्यवसायियों को व्यवसाय दोबारा स्थापित करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था मिले.

वहीं, मुआवजा एवं परिसंपत्तियों की गणना में वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उचित मूल्य निर्धारित करने की मांग भी की गई. निर्देशक

मनीष कुमार टीम के साथ पहुंचे, 15 अक्टूबर तक चर्चा का आश्वासन

जीएम के साथ वार्ता के बाद भी आंदोलनकारी अपनी सभी मांगों के तत्काल समाधान पर अड़े रहे. काफी देर तक चली बातचीत के बाद निर्देशक मनीष कुमार अपनी टीम के साथ आंदोलनकारियों के बीच पहुंचे.

उन्होंने मंच से कहा कि जिन मामलों में तत्काल निर्णय संभव नहीं है, उन पर अधिकारियों के साथ चर्चा कर 15 अक्टूबर तक समाधान की दिशा में निर्णय लिया जाएगा. हालांकि आंदोलनकारी इससे संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने तत्काल ठोस निर्णय की मांग जारी रखी.

इसके बाद आंदोलनकारियों की पांच सदस्यीय टीम को एनसीएल मुख्यालय के अंदर वार्ता के लिए बुलाया गया. अंदर हुई चर्चा में आंदोलनकारियों ने प्रबंधन को तीन से चार दिन के भीतर लंबित मामलों का समाधान करने का अल्टीमेटम दिया.

देर शाम खुले मुख्यालय के गेट, अधिकारियों को निकलने दिया

लगातार चले आंदोलन के बाद देर शाम करीब 9 बजे आंदोलनकारी ने मानवीय दृष्टिकोण दिखाते हुए एनसीएल मुख्यालय के सभी गेट खोल दिए गए. इसके बाद मुख्यालय में मौजूद अधिकारी एवं कर्मचारी अपने घरों के लिए रवाना हुए. हालांकि, आंदोलनकारी अपनी मांगों को लेकर मुख्यालय के बाहर डटे रहे.

मांगें पूरी नहीं होने पर युवा नेता भूख हड़ताल पर बैठे

प्रबंधन के आश्वासन के बावजूद जब आंदोलनकारी संतुष्ट नहीं हुए तो युवा नेता प्रेम प्रकाश सिसोदिया छह अन्य लोगों के साथ मौके पर ही भूख हड़ताल पर बैठ गए. उन्होंने कहा कि जब तक विस्थापितों की प्रमुख मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.

इसके बाद देर रात तक भूख हड़ताल समाप्त कराने के लिए बातचीत का दौर चलता रहा. आखिरकार रात करीब 1 बजे विस्थापन मंच के नेता राजेश सिंह, विनोद कुर्वंशी एवं शेखर सिंह ने प्रेम प्रकाश सिसोदिया और उनके साथ भूख हड़ताल पर बैठे लोगों को समझाकर धरना समाप्त कराया.

दिनभर बाजार बंद, व्यापारियों ने दिया आंदोलन को समर्थन

आंदोलन को लेकर मोरवा में सुबह से ही व्यापक असर देखने को मिला. पूरा बाजार बंद रहा. फल, सब्जी और कई मेडिकल स्टोर सहित अन्य दुकानें भी बंद रहीं. व्यापारियों ने आंदोलन को समर्थन देते हुए इसमें बढ़-चढ़कर सहयोग किया.

सुबह करीब 10 बजे तक हजारों की संख्या में लोग एनसीएल मुख्यालय के समक्ष पहुंच चुके थे. आंदोलन को देखते हुए सिंगरौली पुलिस के करीब 250 जवानों की तैनाती की गई थी. मुख्य गेट पर तालाबंदी के दौरान पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास किया, लेकिन भारी जनसमूह और आंदोलनकारियों के आक्रोश को देखते हुए स्थिति को संभालते हुए पुलिस पीछे हट गई.

पूर्व विधायक रामलल्लू वैश्य समेत सभी दलों के नेता एक मंच पर

संयुक्त मंच के आह्वान पर आयोजित आंदोलन में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े नेता भी एक मंच पर नजर आए. पूर्व विधायक रामलल्लू वैश्य ने भी आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए एनसीएल प्रबंधन पर विस्थापन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की बात रखी.

आंदोलन की सबसे बड़ी तस्वीर यह रही कि मोरवा विस्थापन के अलग-अलग मंच पहली बार एक साझा आंदोलन के तहत एक साथ खड़े दिखाई दिए. आंदोलनकारियों ने कहा कि सभी मंचों की मांगें अलग-अलग होने के बावजूद मूल मुद्दा प्रभावित परिवारों का सम्मानजनक पुनर्वास और उनके अधिकारों की सुरक्षा है.

अब 15 अक्टूबर तक नजर, तीन-चार दिन में समाधान का अल्टीमेटम

देर रात आंदोलन समाप्त होने के बाद भी विस्थापितों ने साफ कर दिया कि आंदोलन की मांगें खत्म नहीं हुई हैं. प्रबंधन की ओर से 22 मांगों पर सहमति और अन्य मामलों पर 15 अक्टूबर तक चर्चा कर समाधान निकालने का आश्वासन दिया गया है. वहीं, आंदोलनकारियों ने कई लंबित मुद्दों पर तीन-चार दिन में ठोस समाधान की मांग रखी है.

अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रबंधन सहमत 22 मांगों को किस तरह लागू करता है और शेष मांगों, विशेषकर शासकीय भूमि पर बसे परिवारों को पट्टाधारकों के समान लाभ, व्यावसायिक पुनर्वास, परिसंपत्तियों के मूल्यांकन और अन्य लंबित पुनर्वास मुद्दों पर क्या निर्णय लिया जाता है.

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