Kannauj bjp internal conflict-कन्नौज की सियासत में अनुशासन वाली पार्टी में रार, विकास की पटरी पर दौड़ रही गुटबाजी की हाईस्पीड ट्रेन!
कन्नौज। उत्तर प्रदेश का कन्नौज वैसे तो अपनी इत्र की खुशबू लिए मशहूर है, लेकिन इन दिनों यहां की हवाओं में विकास की महक कम और अपनों की खिंचाई की गंध ज्यादा आ रही है।अब आप कहेंगे भैया, आखिर ऐसा क्या हो गया। किस पार्टी में अपनों की खिंचाई का ताना-बाना बुना जा रहा है?सपा में तो सन्नाटा है,और बीजेपी तो ठहरी अनुशासन वाली पार्टी।फिर सियासत का ये सारा खेल आखिर चल कहां रहा है?
तो भैया जरा धीरज रखिये,बताता हूं आपको। दरअसल सारा रायता डबल इंजन वाली सरकार में ही फैला है।सुनकर हैरानी हो रही होगी,लेकिन ये सही है सोलह आने सही।अनुशासन वाली पार्टी में इन दिनों शह और मत का खेल जिले के दो नेताओं के बीच खेला जा रहा है।
दरअसल कन्नौज बीजेपी में इन दिनों दो ऐसे इंजन आमने-सामने आ गए हैं,जो एक-दूसरे को पटरी से उतारने पर आमादा हैं।इसका नतीजा ये हो रहा है कि, आगामी विधानसभा चुनाव में संगठन को मजबूत करने के बजाए उसकी दरख्त में दीमक लगाने का काम किया जा रहा है।पार्टी के दो आला नेताओं के समर्थक अपने नेता का औरा भारी दिखाने के चक्कर में सामने वाले नेता के मोहरे को मात देने में जुटे हैं।
कन्नौज की गलियों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि,दुश्मन से लड़ने के बजाए पार्टी के दो धड़े अपने नेताओं की ही जड़े काटने में जुटे हैं।वो कहावत तो आपने सुनी होगी,जब दुश्मन सामने न हो,तो अपनों से लड़कर तलवार की धार जांच लेनी चाहिए। बीजेपी के दो दिग्गजों के समर्थक इसी कहवात को पूरी तरह चरितार्थ करने के लिए शिद्दत से कोशिश कर रहे हैं।
जयंती तो बहाना है,अपनों की ताकत दिखाना है!
राजनीति में किसी दिवंगत नेता की पुण्यतिथि या जयंती केवल उसे याद करने के लिए नहीं होती,बल्कि वहां पहुंचने वाले विरोधी नेताओं को अपनी शक्ति का अहसास कराना भी होता है।कन्नौज से बीजेपी के पूर्व सांसद सुबत पाठक इन दिनों इसी फॉर्मूले पर काम करते हुए दिखाई दे रहे हैं।सुब्रत पाठक के समर्थक पूर्व विधायक बनवारी लाल दोहरे की जयंती के बहाने इसी पटकथा की तैयारी कर रहे हैं।
कन्नौज के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि…
सियासी पंडितों का कहना है कि, पूर्व विधायक की जयंती का असल मकसद उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं,अपने विरोधी की राजनीतिक जड़ों को हिलाना है। इसी क्रम में पाठक गुट के समर्थक बनवारी लाल दोहरे के पौत्र नयन दोहरे को मौजूदा मंत्री के विकल्प के रूप में दिखाना चाहते हैं!जिससे कि, आने वाले चुनाव में असीम अरुण का पत्ता साफ किया जा सके।
सुब्रत पाठक के समर्थकों ने इसके लिए तैयारी भी तेज कर दी है। बाकायदा सोशल मीडिया पर इसके लिए कैंपेन चला रखा है। ‘बाहरी भगाओ, अपनों को जिताओ’ का नारा फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप्स में ऐसे तैर रहा है, जैसे कन्नौज में स्थानीय बनाम प्रवासी का आंदोलन चल रहा हो। पूर्व ब्यूरोक्रेट और मौजूदा मंत्री असीम अरुण को बाहरी बताकर घेरने की यह टेक्नीक सपा के लिए भी वरदान का काम कर रही है।
कटरी कांड पर फेसबुकिया पोस्ट ने किया आग में घी का काम!
दरअसल रजनीश राजपूत पर हुए हमले और मंत्री असीम अरुण को उन्हें देखने जाने के साथ फेसबुक पर फोटो डालने ने इस सुलगती आग में घी डालने का काम किया है।हुआ यूं कि, राजनीश राजपूत हमले की खबर मिलते ही राज्यमंत्री असीम अरुण फौरन जिला अस्पताल पहुंचे। जहां उन्होंने रजनीश का हालचाल जाना और तुरंत इस मौके को कैश करते हुए डिजिटल मीडिया पर अपडेट दाग दिया।मंत्री असीम अरुण ने रजनीश के साथ फोटो को फेसबुक पर पोस्ट करते हुए कैप्शन लिखा कि ‘’एसपी विनोद कुमार को आरोपियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई के निर्देश दे दिए गए हैं।‘’ मंत्री असीम अरुण की इस चाल ने यह साबित कर दिया कि, आज की सियासत में काम से ज्यादा सोशल मीडिया पर पोस्ट और रील्स मायने रखती हैं।
असीम अरुण के क्विक एक्शन पर पाठक गुट का कैमरा एक्शन
मंत्री असीम अरुण ने जैसे ही सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट शेयर की। बस, फिर क्या था! कन्नौज में सुब्रत पाठक के सिपहसालार कहे जाने वाले अनुज गुप्ता एक्टिव हो गए। उन्होंने सोशल मीडिया पर मंत्री जी की इस सक्रियता पर तंज कसते हुए लिखा-
‘’फोटोबाजी से कुछ नहीं होता साहब! पीड़ित से मिलने तो हम भी गए थे, लेकिन हमने उसकी नुमाइश नहीं की।‘’
अनुशासन वाली पार्टी के नेताओं के बीच ऐसी आपसी कलह देखकर कन्नौज की जनता भी ये सोचकर हैरान है कि,आखिर सियासत क्या बला है,जहां किसी घायल शख्स का हाल-चाल पूछने को लेकर भी क्रेडिट वॉर चलता है।
अब जनता यह सोचकर हैरान है कि पीड़ित का दर्द बांटने में भी ‘क्रेडिट वॉर’ चल रहा है। एक गुट का मानना है कि जो सोशल मीडिया पर नहीं दिखा, वो दौरा ही बेकार है; जबकि दूसरा गुट इसे शुद्ध रूप से ‘कैमरा-प्रेम’ करार दे रहा है।
असीम अरुण का जमा रहेगा सिक्का या पाठक गुट पड़ेगा भारी?
एक तरफ पूर्व पुलिस अधिकारी और मंत्री असीम अरुण अपनी सलीकेदार राजनीति और विकास कार्यों के दम पर जनता के बीच पैठ मजबूत करने में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी का ही पुराना कैडर उन्हें यह अहसास कराने में कसर नहीं छोड़ रहा कि नौकरी के नियम और राजनीति के नियम में फर्क होता है।
पूरे मामले पर हाईकमान की चुप्पी
कन्नौज बीजेपी में मचे इस घमासान पर फिलहाल लखनऊ जहां मौन है,वही दिल्ली भी चुप्पी साधे बैठा है।शायद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ये देखना चाहता है कि दो नेताओं के बीच रह रहे इस रस्साकसी में आखिर कुछ निकलता भी है,या फिर दोनों तरफ से केवल हवा-हवाई फायरिंग की जा रही है। लेकिन इस चक्कर में बेचारे जिले का कार्यकर्ता कन्फ्यूज है कि वह सुबह किसके दरबार में हाजिरी लगाए और शाम को किसके फेसबुक पोस्ट पर लाइक और कमेंट करें।
संवाददाता
मुजाहिद मजीदी,कन्नौज
